Wednesday, 2 January 2019

रावण वध के बाद (पौराणिक उपन्यास) - सुधीर मौर्य

#रावण_वध_के_बाद
नायिका प्रधान पौराणिक उपन्यास है। उन्नत रक्ष संस्कृति के विनाश के उपरांत लंका की राजसी स्त्रियों ने जिस प्रकार अयोध्या और किष्किंधा से नियंत्रित विभीषण के शासन के विरुद्ध सतत संघर्ष किया, उसकी रोमांचक गाथा इस उपन्यास में कही गई है।
रावण की दुतीय पत्नी धन्यमालिनी और कुम्भकर्ण की पत्नी वज्रज्वाला इस उपन्यास की केंद्रीय नायिका है इसके अतरिक्त रावण की पुत्री अतुलय और पत्नी श्रीप्रभा व मंदोदरी किस भांति विभीषण का विरोध करती है ये इस उपन्यास के पृष्ठों में अंकित हैं।
रावण वध के बाद उसके जन्मे दो पुत्र बैनासुरिवंश और अरिमर्दन इस उपन्यास के नायक है।
ये उपन्यास विश्व पुस्तक मेला 2019 में (दिनांक 05 जनवरी से 13 जनवरी 2019 तक) सुबह 10:30 बजे से शाम को 7:30 बजे तक प्रगति मैदान के गेट नंबर-10 के पास हॉल नंबर- 12/12A में ■ किताबगंज प्रकाशन ■ की स्टाॅल नंबर-92 पर उपलब्ध है।
सुधीर

Sunday, 3 January 2016

वर्जित (उपन्यास) - सुधीर मौर्य


इश्क़ हो जाना ही काफी नहीं ....
भारत में इश्क़ होता नहीं है करना पड़ता है, धर्म जाति देख कर इश्क़ कीजिये नहीं तो तमाम वर्जनाएं आपको अपनी मंज़िल तक पहुँचने से पहले जकड़ लेंगी

और कहीं एक मुस्लिम लडकी को एक हिन्दू लड़के से इश्क़ हो जाए तो क्या हो वर्जित हो जाती है हर भावना ...

पढ़ें बहुप्रतीक्षित उपन्यास "वर्जित"
आज से आनलाइन बुक स्टोर्स पर उपलब्ध

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Saturday, 9 May 2015

नपुंसक (लघुकथा) - सुधीर मौर्य

'देखो तुम्हारे अतीत को जानते हुए भी मैने तुमसे शादी की।पति सुहागरात को पहले लैंगिक संसर्ग के बाद पत्नी से बोला।
पत्नी ने पति की बात सुनकर अपनी झुंकी आँखे और झुंकी दी।
'कहो अब कौन महान है मैं या वो तुम्हारा प्रेमी ?' पति वापस तनिक घमंड से बोला।
पत्नी अब भी वैसे ही बैठी रही। मूक और नत मुख।
'कहीं वो नपुंसक तो नहीं था?' पति, पत्नी के मन में उसके प्रेमी के लिए घृणा का भाव पैदा करने की गर्ज़ से बोला।

पति की बात सुनकर पत्नी को वो दिन याद गए जब वो अपने प्रेमी के साथ प्रेम गीत गाती थी।  
उसका प्रेमी उसे बेहद प्रेम करता था  कई बार वो उसके साथ एक ही चादर में लेटा था पर कभी चुम्बन आदि से आगे बढ़ा। और फिर एक रात जब उसने  खुद काम के वश    में होकर अपने प्रेमी से कहा 'उसकी इच्छा पूरी करो' तभी उसने उसके साथ दैहिक सम्बन्ध बनाया।
पत्नी को चुप देख पति वापस बोला - 'क्या वो वाक़ई नपुंसक था। '
पत्नी का मन किया वो कह दे अपने पति से - नपुंसक वो नहीं था जो प्रेम की पवित्रता निभाता रहा, जो हर राह में मेरे साथ में खड़ा रहा। मेरी पढ़ाई का खर्च उठता रहा। मेरे एक बार कहने पर चुपचाप मेरी ज़िन्दगी से दूर हो गया। और तुम्हारे मांगे के दहेज़ की राशि उसने दी अपने सिद्धांतो के विरुद्ध जाके।  अरे नपुंसक तो तुम हो जो अच्छी खासी नौकरी करते हुए भी बिना दहेज़ के शादी को तयार नहीं हुए।
पत्नी अभी सोच ही रही थी कि पति ने खींच कर वापस उससे लैंगिक संसर्ग करने लगा और पत्नी चुपचाप एक 'नपुंसक' के सीने से चिपट गई।

(परिंदे पत्रिका के जनवरी - फ़रवरी १५ के अंक में प्रकाशित।)

--सुधीर मौर्य
गंज जलालाबाद,  उन्नाव
२०९८६९

उत्तर प्रदेश

Thursday, 29 May 2014

माई लास्ट अफेयर - सुधीर मौर्य

उसके पाँव देखकर मुझे खुद को लिखी कविता की एक लाईन याद आ गई थी। जिसमें होठों ही होठों में गुनगुना उठा था।
``तेरे ये चाँद से पाँव''
यकीनन उसके पाँव जमीं से नजर आने वाले बादलों के पार के चाँद की खूबसूरती को किसी भी स्पर्धा में कभी भी हरा सकते थे। उसके पाँव के अंगूठे और अंगुलियों की नक्काशी ताजमहल की नक्काशी से कहीं बेहतर थी। मुझे तो ये लगा कारीगर ने किसी हूर के खातिर बनाये गये पैरों को इस नाजनीन के लगा दिया था। मुझे इस वक्त छ: स्ट्रिप (दो टी शर्ट की और चार चप्पल की) से ईर्ष्या होने लगी थी जो उसके सबसे प्यारी जगहों से बेखोफ-बेलोस चिपकी हुई थी।
फंतासी 'माई लास्ट अफेयर' से
--सुधीर मौर्य

Thursday, 27 February 2014

अमलतास के फूल (उपन्यास) - सुधीर मौर्य

प्रस्तुत उपन्यास ’अमलतास के फूल’ मेरा दूसरा उपन्यास है एवम् सब विधाओं में मिला कर सातवीं कृति । वस्तुतः पठन-पाठन और लेखन में खुद को बचपन से सम्बद्ध पाता हूँ । प्रस्तुत उपन्यास को भी मैंने कोई सन् 2003 में लिखना आरम्भ किया था, कोई सत्रह पृष्ठ लिखने के बाद कुछ मानसिक आघातों के कारण से इस को जो सन्दूक में डाला तो फिर मे वापिस 2012 में निकाला और अब ये सम्पूर्ण हो कर आप सब के सामने आने को है ।

नौ साल का अन्तराल बहुत होता है । सो जाहिर सी बात है मेरे उस वक्त के सोचे कथानक से इस का कथानक थोडा सा भिन्न हो गया है । पर मूल वही बना रहे, इस का ध्यान मैंने रखा है ।

सन् 2003 से सन् 2004 का मेरा जीवन काल, तमाम मानसिक पीडाओं से गुजरा, जिस का विस्तार में जिक मैं कभी फिर करूँगा । हां, इतना अवश्य है कि इन कारणों की वजह से पूरे पाँच साल मेरा लेखन कार्य प्रभावित रहा है । खैर, वह सब अब अतीत है । अब मैं वर्तमान में खुश रहना चाहता हूँ ।

उपन्यास कैसा बन पडा, इस सब के बारे में राय तो आप लोग ही देंगे, जिस का मैं बेसब्री से इन्तजार करूँगा ।   (for novel plz contact 09699787634 / sudheermaurya1979@rediffmail.com)  

Tuesday, 3 September 2013

एक गली कानपुर की (उपन्यास) - सुधीर मौर्य

मुक्कमल ख़ामोशी रही थी। कुछ देर शांत बैठे रहने के बाद संदीप उठा अपने हाथो से  उसने बच्चे के चेहरे से कपडा हटाया, सिर्फ  कुछ पल निहारा था उसे और फिर  के कमरे से वो बहार चला गया।                                                                                                                                                  कुदरत, श्रृष्टि सबसे बड़े शाहकार  हैं उसने अजूबे को  दिया था। में जो पल्लवी के साथ जिस्मानी तौर पर कभी  सोया था। जिसने कभी उसे सम्पूर्ण   देखा था उससे पैदा हुए बच्चे की शक्ल मेरी थी।                                                                                                                                                                                                -क्या यही आत्मा का प्यार था।                                                                                                                      -इश्क रूहों   का।                                                                                                                                          -मिलन  के  मन के हिलोरों का।                                                                                                                                                                                                                                                                            उपन्यास 'एक गली कानपुर की ' का अंश                                                                                                                                  सुधीर मौर्य